रत्न धारण

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रत्न धारण

ज्योतिष–शास्त्र में बताये गये विभिन्न उपायों में रत्नो का भी बड़ा विशेष महत्व है रत्न ग्रहों के द्वारा ब्रह्माण्ड में फैली उनकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराकर एक विशेष फ़िल्टर का कार्य करते हैं पर सर्वप्रथम तो यह समझना चाहिए के रत्न धारण करने से होता क्या है इसके विषय में यह स्मरण रखें के रत्न पहनने से किसी ग्रह से मिल रही पीड़ा समाप्त नहीं होती या किसी ग्रह की नकारात्मकता समाप्त नहीं होती बल्कि किसी भी ग्रह का रत्न धारण करने से उस ग्रह की शक्ति बढ़ जाती है अर्थात जिस ग्रह से सम्बंधित रत्न पहना है आपकी कुंडली का वह ग्रह बलवान बन जाता है उससे मिलने वाले तत्वों में वृद्धि हो जाती है परन्तु हमारी कुंडली में सभी ग्रह हमें शुभ फल देने वाले नहीं होते कुछ ग्रह हमारी कुंडली के अशुभ कारक ग्रह होते हैं और उनकी भूमिका हमें समस्या, संघर्ष और कष्ट देने की ही होती है अब यदि ऐसे ग्रह का रत्न धारण कर लिया जाये तो वह अशुभ कारक ग्रह भी बलवान हो जायेगा जिससे वह और अधिक समस्याएं देगा अतः यह तो निश्र्चित है के किसी भी व्यक्ति के लिए हर एक रत्न शुभ नहीं होता।
रत्न धारण में हमारी जन्मकुंडली की लग्न का ही महत्व होता है कुंडली के लग्नेश और लग्नेश के मित्र ग्रह जो त्रिकोण(1,5,9) के स्वामी भी हों उन्ही ग्रहों का रत्न धारण किया जाता है। यह बात भी ध्यान रखें के रत्न धारण का कुंडली में चल रही दशाओं से भी कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है ऐसा बिलकुल नहीं है के जिस ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चल रही है उसी ग्रह का रत्न धारण कर लिया जाये तो बिना विश्लेषण के यह हानिकारक हो सकता है क्योंकि केवल हमारी कुंडली के शुभ फल कारक ग्रहों के रत्न ही धारण किये जाते है जो हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं

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