मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों की शांति

मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों की शांति

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मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों की शांति के लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि को बादाम-मेवा युक्त खीर को रात में चाँद की रौशनी में रख कर दूसरे दिन भगवान् को ह
भोग लगा कर तथा ब्राह्मणों को खिलाने के बाद स्वयं खाने से अनेक रोगों में शांति मिलती है।

श्रावण एवं माघ मास में सोमवार के व्रत करना, प्रतिदिन शिवलिंग पर कच्ची लस्सी एवं बेलपत्र पंचाक्षरी मन्त्र बोलकर चढ़ाना, श्री शिव पंचाक्षर स्त्रोत्र, शिव चालीस आदि का पाठ करना एवं घी का दीपक जलाना कल्याणकारक होता है।

चंद्र की महादशा एव अंतर्दशा में यदि अनिष्टकारक योग हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट का भय होता है।इस दोष की निवृत्ति के लिए महामृत्युंजय, शिवसहस्त्रनाम का जाप पाठ एवं चंद्र का दान करना चाहिए।
चंद्र में शनि की अंतर्दशा में मृत्युंजय जप एवं शनि का दान करना चाहिए।

चंद्र में शुक्र अथवा सूर्य की अंतर दशा में क्रमशः रूद्र-जप तथा शिव पूजन व् श्वेत वस्त्र, क्षीर आदि का दान करना चाहिए।

जन्म कुंडली में चंद्र यदि मातृ दोष कारक है तो हर अमावस विशेषकर सोमवती अमावस को पहले शिव परिवार का पूजन कच्ची लस्सी, बेल पत्र, अक्षत,धुप, दीप आदि मन्त्र सहित करने के बाद पीपल पर भी कच्ची लस्सी में सफ़ेद तिल डालकर चढ़ाना एवं घी का दीपक जलाना शुभकारक होता है।तदोपरांत ब्राह्मण को फल – दूध आदि का दान करें।

 शुक्ल पक्ष के सोमवार अथवा पूर्णमाशी से शुरू करके प्रत्येक सोमवार और पूर्णमाशी को मन्त्र जप करते हुए पंचगव्य, स्फटिक, मोती, सीप, शंख, बिल्व, कमल, सफ़ेद चन्दन, गौ दूध, गोबर, गौ मूत्र, सफ़ेद तिल, चावल, गंगाजल, एवं सफ़ेद पुष्प जल में डाल कर औषधीय स्नान करने से चंद्र जनित अनेक कष्टो से शांति मिलती है।

 

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