गायत्री साधना से अनेकों कार्यो की सिद्धि

गायत्री साधना से अनेकों कार्यो की सिद्धि

गायत्री मन्त्र सर्वोपरी मन्त्र है। इससे बड़ा और कोई मन्त्र नहीं। जो काम संसार के किसी अन्य मन्त्र से नहीं हो सकता, वह निश्चित रूप से गायत्री मंत्र द्वारा हो सकता है। यह एक प्रचण्ड शक्ति है, जिसे जिधर भी लगा दिया जायेगा, उधर ही चमत्कारिक सफलता मिलेगी।
1) लगातार बारह वर्ष तक प्रतिदिन कम से कम एक माला नित्य जप किया हो।

(2) गायत्री की ब्रह्मसन्ध्या को नौ वर्ष किया हो।

(3) ब्रह्मचर्यपूर्वक पाँच वर्ष तक प्रतिदिन एक हजार मन्त्र जपे हों।

(4) चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया हो।

(5) पाँच वर्ष तक विषेष गायत्री जप किया हो। जो व्यक्ति इन साधनाओं में कम से कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, वे गायत्री मन्त्र का काम्य कर्म में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास है, वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं।

गायत्री मंत्र प्रयोग की विधियाँ दी जाती हैंः-
बुद्धि वृद्धिः- गायत्री मंत्र प्रधानतः बुद्धि को शुद्ध, प्रखर और समुन्नत करने वाला मन्त्र है। मन्द बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी वाले लोग इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते हैं। जो बालक अनुत्तीर्ण हो जाते हैं, पाठ ठीक प्रकार याद नहीं कर पाते, उनके लिये निम्न उपासना बहुत उपयोगी है।

सूर्योदय के समय की प्रथम किरणें पानी से भीगे हुए मस्तक पर लगने दें। पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों से सूर्य का दर्शन करते हुए आरम्भ में तीन बार ऊँ का उच्चारण करते हुए गायत्री मंत्र का जप करें। कम से कम एक माला (108 मन्त्र) अवश्य जपना चाहिये। पीछे हाथों की हथेली का भाग सूर्य की ओर इस प्रकार करें मानो आग पर ताप रहे हैं। इस स्थिति में बारह मन्त्र जपकर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिये और उन उष्ण हाथों को मुख, नेत्र, नासिका, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक आदि समस्त षिरोभागों पर फिराना चाहिये।

राजकीय सफलताः- किसी सरकारी कार्य, मुकदमा, राज्य स्वीकृति, नियुक्ति आदि में सफलता प्राप्त करने के लिये गायत्री मंत्र का उपयोग किया जा सकता है। जिस समय अधिकारी के सम्मुख उपस्थित होना हो अथवा कोई आवेदन पत्र लिखना हो, उस समय यह देखना चाहिये कि कौन सा स्वर चल रहा है। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो, तो पीतवर्ण ज्योति का मस्तिष्क में ध्यान करना चाहिये और यदि बायाँ स्वर चल रहा हो, तो हरे रंग के प्रकाश का ध्यान करना चाहिये। मंत्र में सप्त व्याहृतियाँ (ऊँ भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्य्) लगाते हुए बारह मन्त्रों का मन ही मन जप करना चाहिये। दृष्टि उस हाथ के अँगूठे के नाखून पर रखनी चाहिये, जिसका स्वर चल रहा हो। भगवती की मानसिक आराधना, प्रार्थना करते हुए राजद्वार में प्रवेश करने से सफलता मिलती है।

दरिद्रता का नाशः- दरिद्रता, हानि, ऋण, बेकारी, साधनहीनता, वस्तुओं का अभाव, कम आमदनी, बढ़ा हुआ खर्च, कोई रुका हुआ आवश्यक कार्य आदि की व्यर्थ चिन्ता से मुक्ति दिलाने में गायत्री साधना बड़ी सहायक सिद्ध होती है। उससे ऐसी मनोभूमि तैयार हो जाती है, जो वर्तमान अर्थ-चक्र से निकालकर साधक को सन्तोषजनक स्थिति पर पहुँचा देती है।

दरिद्रता नाश के लिये गायत्री की ‘श्रीं’ शक्ति की उपासना करनी चाहिये। मंत्र के अन्त में तीन बार ‘श्रीं’ बीज का सम्पुट लगाना चाहिये। साधना काल के लिये पीत वस्त्र, पीले पुष्प, पीला यज्ञोपवीत (केशर से रंगा हुआ), पीला तिलक, पीला आसन प्रयोग करना चाहिये और रविवार को उपवास करना चाहिये। शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिष करनी चाहिये। पीताम्बरधारी, हाथी पर चढ़ी हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिये। पीतवर्ण लक्ष्मी का प्रतीक है। भोजन में भी पीली चीजें प्रधान रूप से लेनी चाहिये। इस प्रकार की साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।

सुसन्तति की प्राप्तिः- जिसकी सन्तान नहीं होती हैं, होकर मर जाती हैं, रोगी रहती हैं, गर्भपात हो जाते हैं, केवल कन्याएँ होती हैं, तो इन कारणों से माता-पिता को दुःखी रहना स्वाभाविक है। इस प्रकार के दुःखों से भगवती की कृपा द्वारा छुटकारा मिल सकता है।
इस प्रकार की साधना में स्त्री-पुरुष दोनों ही सम्मिलित हो सकें, तो बहुत ही अच्छा है। एक पक्ष के द्वारा ही पूरा भार कन्धे पर लिये जाने से आंशिक सफलता ही मिलती है। प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख होकर साधना पर बैठें। नेत्र बन्द करके श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत, किषोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में धारण किये हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन सम्पुट लगाकर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।

नासिका से साँस खींचते हुए पेडू तक ले जानी चाहिए। पेडू को जितना वायु से भरा जा सके भरना चाहिये। फिर साँस रोककर ‘यं’ बीज सम्पुटित गायत्री का कम से कम एक, अधिक से अधिक तीन बार जप करना चाहिये। इस प्रकार पेडू में गायत्री शक्ति का आकर्षण और धारण कराने वाला यह प्राणायाम दस बार करना चाहिये। तदनन्तर अपने वीर्यकोष या गर्भाषय में शुभ्र वर्ण ज्योति का ध्यान करना चाहिये।

यह साधना स्वस्थ, सुन्दर, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान सन्तान उत्पन्न करने के लिये है। इस साधना के दिनों में प्रत्येक रविवार को चावल, दूध, दही आदि केवल श्वेत वस्तुओं का ही भोजन करना चाहिये।

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