द्वादश भाव का परिचय

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*द्वादश भाव कुंडली का अंतिम भाव होने से मनुष्य जीवन का भी अंतिम भाग है| प्रथम भाव(लग्न) से गणना करने पर द्वादश भाव सबसे आख़िरी भाव है अतः एक प्रकार से यह जीवनचक्र का अंत दर्शाता है| जो कुछ भी प्रारंभ हुआ है, उसे एक न एक दिन समाप्त होना है, क्योंकि लग्न जीवनारंभ का सूचक है इसलिए द्वादश भाव जीवन की समाप्ति को प्रदर्शित करता है| लग्न मनुष्य की जीवन शक्ति है, उसकी उर्जा है तथा द्वादश भाव उस उर्जा का व्यय कारक है| इसलिए इस भाव को व्यय स्थान भी कहा जाता है| फारसी में इस भाव को ख़र्च खाने कहते हैं| मनुष्य द्वारा प्राप्त जीवन, धन, यश, प्रसिद्धि आदि की हानि या नाश द्वादश भाव कर देता है इसलिए इस भाव को हानि या नाश स्थान भी कहते हैं| यह भाव त्रिक(6,8,12) भावों में से एक है| इस भाव का स्वामी प्रायः अशुभ माना जाता है परंतु यदि कोई ग्रह सिर्फ द्वादश भाव का स्वामी हो तथा अन्य किसी भी भाव का स्वामी न हो तो वह भावेश तटस्थ रहता है|*

*द्वादश भाव के स्वामी का किसी दूसरे भाव में बैठना या किसी दूसरे भाव के स्वामी का द्वादश भाव में स्थित होना उस भाव के फल का नाश कर देता है| इसी आधार पर प्रत्येक भाव से द्वादश(पिछला) भाव, उस भाव के लिए विनाशकारी होता है| द्वादश भाव के स्वामी का प्रभाव अलगाववादी होता है| इस भाव से व्यय, नाश, हानि,गुप्त शत्रु, बाया नेत्र, पैर, दंड, कारावास, अस्पताल, प्रवास, दान, दुर्गति, धन का सद्व्यय या अपव्यय, अंत, विदेशगमन, शयनकक्ष, दृष्टि की हानि, जल से मृत्यु, ग़रीबी, दुःख-संताप, मोक्ष, पारलौकिक विद्या, एकांत, सन्यास, त्याग, जीवनसाथी का अन्य प्रेम संबंध, निद्रा, स्वप्न, दुर्भाग्य, बदनामी, फरेब आदि का विचार किया जाता है| इस भाव का कारक ग्रह शनि है|*

*द्वादश भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-*

*नेत्र कष्ट- द्वादश भाव मनुष्य के बाएँ नेत्र से संबंधित है| क्योंकि हमारी आँखें प्रकाश के माध्यम से ही देख पाती हैं इसलिए यदि द्वादश(हानि) भाव में सूर्य या चन्द्रमा जैसे प्रकाशकारक ग्रह स्थित हों और पाप ग्रहों से पीड़ित हों तो व्यक्ति के नेत्रों में कष्ट होता है|*

*जल द्वारा मृत्यु- किसी भी कुंडली में चतुर्थ, अष्टम तथा द्वादश भाव जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं| इसलिए द्वादश भाव एक जलीय भाव है| द्वादादेश तथा चतुर्थेश का प्रभाव जब भी अष्टम भाव(मृत्यु का स्वरुप) तथा अष्टमेश पर हो तो व्यक्ति की मृत्यु जल में डूबने से होती है|*

*विपरीत राजयोग- किसी भी जन्मकुंडली में छठा, आठवाँ तथा बारहवाँ भाव अशुभ माने जाते हैं| द्वादश भाव हानि का है इसलिए जब भी द्वादश भाव का स्वामी छठे या आठवें भाव(अशुभ भावों में स्थित होकर अशुभता की हानि अर्थात शुभफल) में स्थिति होकर पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो विपरीत राजयोग का सृजन करता है| जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को असीम धन-संपति व भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है|*

*जीवनसाथी का दूसरे विपरीत लिंग से प्रेम संबंध- जन्मकुंडली में छठा तथा ग्यारहवां भाव शत्रु व अन्यत्व के प्रतीक होते हैं| द्वादश भाव सप्तम स्थान(जीवनसाथी) से छठा(शत्रु) होता है इसलिए यह वैवाहिक जीवन में किसी दूसरे व्यक्ति के प्रवेश अर्थात घुसपैठ को दर्शाता है| द्वादश भाव शैय्या सुख का भी है| यदि व्यक्ति की कुंडली में छठे व ग्यारहवें भाव के स्वामी(शत्रु व अन्यत्व) तथा राहु(बाहरी तत्व) का संबंध द्वादश भाव(शय्या सुख व भोग) व उसके स्वामी हो जाए तो मनुष्य का जीवनसाथी बाहरी व्यक्ति (परस्त्री या परपुरुष) से प्रेम संबंध रखता है अर्थात बेवफ़ा होता है|*

*मोक्ष- द्वादश भाव का कुंडली का अंतिम भाव होने से इसका संबंध मोक्ष से है| यदि लग्नेश का नवम भाव(धर्म स्थान) व नवमेश से शुभ संबंध हो और द्वादश भाव तथा द्वादादेश पर भी शुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा हो तो मृत्यु के उपरांत मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है| यदि द्वादश भाव में केतु स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा हो तो यह भी मोक्ष का सूचक है|*Astro Tarun k. tiwari

*पाँव(पैर)- द्वादश भाव को कालपुरुष का पैर माना गया है| यदि, द्वादश भाव, द्वादादेश, मीन राशि तथा गुरु पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य को पैरों से संबंधित कष्ट जैसे पोलियो, लंगड़ापन आदि रोग होते हैं|*

*व्यय- द्वादश भाव जन्मकुंडली का अंतिम भाव होने से इसका संबंध हानि, ख़र्च या व्यय से है| मनुष्य के व्यय की प्रकृति किस प्रकार की होगी इसकी सूचना हमे द्वादश भाव से ही मिलती है| यदि द्वादश भाव तथा द्वादशेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का व्यय सत्कर्मों में(दान, धर्म, पुण्य) होता है इसके विपरीत यदि इन घटकों पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य अपने धन को गलत तरीके से ख़र्च करता है|*

*निद्रा व अनिद्रा- द्वादश भाव का संबंध शयन सुख से है अतः इसका निद्रा से भी घनिष्ठ संबंध है| उत्तम स्वास्थ्य हेतु उचित निद्रा लेना अति आवश्यक माना गया है| यदि द्वादश भाव व द्वादादेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति गहरी व अच्छी नींद का आनंद लेता है इसके विपरीत यदि यह घटक पाप ग्रहों से पीड़ित हों तो मनुष्य को अनिद्रा(नींद न आना) की समस्या होती है| यह भाव निद्रा का होने के कारण स्वप्न से भी संबंधित है|*

*विदेश यात्रा या विदेश वास- द्वादश भाव निवास स्थान से दूर विदेशी भूमि को दर्शाता है| वैसे भी यह भाव चतुर्थ स्थान(घर या निवास) से नवम(लंबी यात्रा) है इसलिए घर से दूरी का प्रतीक है| अतः यह भाव मनुष्य के विदेश में निवास करने से भी संबंधित है|*
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